बलात्कार के लिए कड़वी गोली


सरकार तुरंत नया कानून बनाए और ऐसे मामलों में अधिक से अधिक एक माह में अदालतें अपना फैसला सुनाएं- डॉ. वेदप्रताप वैदिक

बलात्कार के लिए कड़वी गोली


हैदराबाद में एक युवती के साथ हुई बलात्कार और हत्या की घटना ने एक बार फिर देश का दिल दहला दिया है। ऐसी तीन-चार घटनाएं अभी-अभी देश के कई हिस्सों में हुई हैं। दिल्ली में निर्भया के साथ 7 साल पहले हुई इस तरह की घटना ने सारे देश को हिला दिया था लेकिन हैदराबाद में डाॅ. प्रियंका रेड्डी के साथ जो हुआ है, वह निर्भया से ज्यादा नृशंस कांड है। निर्भया बच गई थी। उसका इलाज भी हुआ। फिर उसे जाना ही पड़ा लेकिन प्रियंका को तो बलात्कार के बाद जला दिया गया। ऐसा क्यों हुआ ? यह बार-बार और जगह-जगह क्यों हो रहा है ? मैं कहता हूं कि यह बराबर होता ही रहेगा। हमारी जैसी पुलिस है, सरकारें हैं, अदालतें हैं, हमारा समाज है, उसको भी यदि कड़वी गोली नहीं देंगे तो इससे भी भयंकर कांड देखने और सुनने में आएंगे। पहला सवाल तो यह कि निर्भया के हत्यारों को फांसी देने में सात साल क्यों लग रहे हैं ? उन्हें सात दिन में ही फांसी क्यों नहीं दी गई ? उन्हें जेल के अंदर ही क्यों लटकाया जाए ? उन्हें चांदनी चौक या कनाट प्लेस में क्यों नहीं लटकाया जाए ताकि उन्हें अपने कुकर्म की सजा तो मिले ही, भावी बलात्कारियों की हड्डियां भी कांप जाएं। अपराध आज हो और उसकी सजा सालों-साल बाद मिले तो किसे क्या याद रहेगा ? उस सजा का कोई सामाजिक प्रभाव नहीं होगा। देश के करोड़ों लोगों के लिए वह सजा हुई या नहीं हुई, एक बराबर होगी। अर्थात सरकार तुरंत नया कानून बनाए और ऐसे मामलों में अधिक से अधिक एक माह में अदालतें अपना फैसला सुनाएं। मैं तो हैदराबाद के बलात्कारियों की माताओं को (जिनमें मुसलमान और हिंदू, दोनों हैं) प्रणाम करता हूं, जिन्होंने कहा है कि ये बलात्कारी उनके बेटे हैं तो क्या हुआ ? उन्हें कठोरतम सजा दी जानी चाहिए। हमारे उन वकीलों को भी अब क्या कुछ शर्म आएगी, जो बलात्कारियों और हत्यारों के झूठे मुकदमे लड़ते हैं ? पैसों के लिए वे अपना ईमान बेचते हैं ? यह तो हुई कानूनी कार्रवाई लेकिन इससे भी बेहतर है, नैतिक कार्रवाई ! क्या हमारे स्कूल-कालेजों में बच्चों को हम यह संकल्प भी करवाते हैं कि ‘‘मातृवत परदारेषु, परद्रव्येशु लोष्ठवत’’ याने पराई स्त्री माता के समान और पराया पैसा मिट्टी के समान होता है ? पश्चिम के भौतिकवाद में फंसकर हम बच्चों को उलटी पट्टी पढ़ने देते हैं। और फिर इंटरनेट पर बेलगाम चल रही और सिनेमा और विज्ञापनों में बढ़ रही नग्नता क्या नौजवानों को प्रवाहपतित नहीं करती ? उस पर तत्काल रोक क्यों नहीं लगाई जाती ? अब विनोबा भावे के अश्लील पोस्टर- विरोधी आंदोलनों की देश को पहले से ज्यादा जरुरत है। सिर्फ लचर-पचर कानून से बलात्कार बंद नहीं होगा। भाजपा सरकार चाहे तो इस मामले में कुछ एतिहासिक कदम उठा सकती है।

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