पीएम मोदी के ‘मन की बात’: प्रवासी मजदूरों को लगी सबसे गहरी चोट


लॉकडाउन के दौरान सबसे ज्यादा दिल दुखानें वाली तस्वीर वो थी, जहां प्रवासी मजदूरों को अक्सर सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गाँवों तक पैदल जाते देखा गया, अक्सर बिना भोजन या पानी के, 60 दिनों की तालाबंदी की सबसे दिल दहला देने वाली तस्वीर एक ये थी।

पीएम मोदी के ‘मन की बात’: प्रवासी मजदूरों को लगी सबसे गहरी चोट


प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अपने महीने के मासिक रेडियो संबोधन "मन की बात" में प्रवासी श्रमिकों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकोप के दौरान उन्हें सबसे कठिन चोट लगी है। "उन लोगों का कोई वर्ग नहीं है जो COVID-19 के प्रकोप के कारण पीड़ित नहीं हुए, लेकिन गरीब, मजदूरों ने सबसे कठिन मार झेली है”

अब देश में काफी कुछ खुल चुका है। श्रमिक स्पेशल ट्रेनें, हवाई जहाज, कई उद्योग धीरे धीरे चलने लगे हैं। ऐसे में हमें और ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।

दो गज दूरी का नियम, मुंह पर मास्क लगाना, जहां तक हो सके घर में ही रहना, इन बातों का ध्यान रखना है और ढिलाई नहीं बरतनी है: पीएम pic.twitter.com/ego3Mr8zBT

— BJP (@BJP4India) May 31, 2020

केंद्र सरकार ने इस बीच जो फैसले लिए हैं, उससे गांवों में रोजगार, स्वरोजगार और लघु उद्योग से जुड़ी विशाल संभावनाएं खुली हैं।

ये फैसले आत्मनिर्भर भारत के लिए हैं।

कई लोग अब लोकल प्रोडक्ट्स को ही खरीद रहे हैं और Vocal for local को प्रमोट कर रहे हैं: पीएम मोदी #MannKiBaat pic.twitter.com/eHRrRJxzlT

— BJP (@BJP4India) May 31, 2020

लॉकडाउन के दौरान सबसे ज्यादा दिल दुखानें वाली तस्वीर वो थी, जहां प्रवासी मजदूरों को अक्सर सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गाँवों तक पैदल जाते देखा गया, अक्सर बिना भोजन या पानी के, 60 दिनों की तालाबंदी की सबसे दिल दहला देने वाली तस्वीर एक ये थी।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च से देशव्यापी तालाबंदी की घोषणा की थी, जिसके बाद देश भर में फैले लगभग 4 करोड़ प्रवासी श्रमिकों के रोजगार पर ताला लग गया था। परिवहन बंद होने के केवल चार घंटे पहले मिली जानकारी के बाद उन्होंने खुद को फंसा हुए पाया था।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा भोजन और आश्रय के आश्वासन के बावजूद, अधिकांश को खुद के लिए सहारा ढ़ूढना पड़ा।

पिछले हफ्तों में, कई लोगों की लंबी पैदल यात्रा के दौरान मृत्यु हो गई। राजमार्ग पर दुर्घटनाओं में अन्य लोगों की मौत भी हुई जब लोगों ने ट्रक, टेम्पो, ऑटो रिक्शा और यहां तक ​​कि साइकिल जैसे अवैध और असुरक्षित तरीके से घर जाने की कोशिश की गई। फिर भी अन्य लोग केंद्र सरकार द्वारा संचालित मजदूरों के लिए विशेष ट्रेनों में भी भूख और थकावट से अपनी जान गवां बैठे। प्रवासी श्रमिकों के मुद्दे पर सरकार की तीखी आलोचना की गई है।

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