किसान-आंदोलनः आशा बंधी


सरकार आखिरकार मान गई है कि वह एक-डेढ़ साल तक इन कृषि-कानूनों को ताक पर रख देगी और एक संयुक्त समिति के तहत इन पर सार्थक विचार-विमर्श करवाएगी।

किसान-आंदोलनः आशा बंधी


*डॉवेदप्रताप वैदिक*

कल किसान नेताओं और मंत्रियों के सार्थक संवाद से यह आशा बंधी है कि इस बार का गणतंत्र-दिवसगनतंत्र दिवस में कदापि नहींबदलेगा। यों भी हमारे किसानों ने अपने अहिंसक आंदोलन से दुनिया के सामने बेहतरीन मिसाल पेश की है। उन्होंने सरकार से वार्ता केलगभग दर्जन भर दौर चलाकर यह संदेश भी दे दिया है कि वे दुनिया के कूटनीतिज्ञों-जितने समझदार और धैर्यवान हैं। उन्होंने अपनेअनवरत संवाद के दम पर आखिरकार सरकार को झुका ही लिया है। सरकार आखिरकार मान गई है कि वह एक-डेढ़ साल तक इन कृषि-कानूनों को ताक पर रख देगी और एक संयुक्त समिति के तहत इन पर सार्थक विचार-विमर्श करवाएगी। उसने बिना कहे ही यहमान लिया कि उसने सर्वोच्च न्यायालय के कंधे पर से जो छर्रे छोड़े थेवे फुस्स हो गए हैं। 

अदालत ने चार विशेषज्ञों की समिति घोषितकरके जबर्दस्ती ही अपनी दाल पतली करवाई। अब वह अपनी इज्जत बचाने में जुटी हुई है। अच्छा हुआ कि सरकार अदालत के भरोसेनहीं रही। अब जो कमेटी बनेगीवह एकतरफा नहीं होगी। उसमें किसानों की भागीदारी भी बराबरी की होगी। अब संसद भी डटकर बहसकरेगी। किसानों को सरकार का यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार लेना चाहिए।

सरकार का यह प्रस्ताव अपने आप ही यह सिद्ध कर रहा है कि हमारी सरकार कोई भी बड़ा फैसला लेते वक्त उस पर गंभीरतापूर्वकविचार नहीं करती।  तो मंत्रिमंडल उस पर ठीक से बहस करता है संसदीय कमेटी उसकी सांगोपांग चीर-फाड़ करती है और  हीसंसद में उस पर जमकर बहस होती है। सरकार सिर्फ नौकरशाहों के इशारे पर थिरकने लगती है। यह किसान आंदोलन मोदी सरकार केलिए अपने आप में गंभीर सबक है। फिलहालसरकार ने जो बीच का रास्ता निकाला हैवह बहुत ही व्यावहारिक है। यदि किसान इसेरद्द करेंगे तो वे अपने आप को काफी मुसीबत में डाल लेंगे।

यों भी पिछले 55-56 दिनों में उन्हें पता चल गया है कि सारे विरोधी दलों नेजोर लगा दियाइसके बाजवूद यह आंदोलन सिर्फ पंजाब और हरयाणा तक ही सीमित रहा है। किसानों के साथ पूर्ण सहमति रखनेवालेलोग भी चाहते हैं कि किसान नेता इस मौके को हाथ से फिसलने  दें। पारस्परिक विचार-विमर्श के बाद जो कानून बनेंवे ऐसे होंजोभारत को दुनिया का सबसे बड़ा खाद्यान्न-सम्राट बना दें और औसत किसानों की आय भारत के मध्यम-वर्गों के बराबर कर दे।

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